शबनमी रात
कांपते होंठो से
चाँद को सहलाती है
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …
सर्द हवा
सरगोशी से
कुछ कह जाती है
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …
सुरमई बादल
तारों के आँगन में
रोज़ मिलते हैं
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …
महकता मोगरा
साथ मौसम की अंगडाई
बहकती है खुशबू
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …
ख्वाब की तन्हाई
चुपके से जगती है
तुम फ़िर याद आते हो
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …
बहुत दूर से आती है ...

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