ये शामें, सब की शामें ...
जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया
जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया
जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में
ये शामें
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?
.....धर्मवीर भारती ।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
kabhi kisi raat der tak jaagte rahe, aur man kahan kahan bhatakta raha, unhi kuch raaton ki kahani yahan likh raha hu....
No comments:
Post a Comment