13 June 2009

ये शामें...

ये शामें, सब की शामें ...
जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया
जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया
जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में
ये शामें
क्या इनका कोई अर्थ नहीं ?

.....धर्मवीर भारती ।

तुम याद आए......


रात अधूरी ,
बात अनकही ,
तुम याद आए ...

खामोश चाँदनी ,
पुरवाई ,
तुम याद आए ...

बहकी बारिश,
भीगा मन ,
तुम याद आए ...

झिलमिल तारे ,
जागे सपने ,
तुम याद आए ...

झुकती पलकें ,
बहते बादल ,
तुम याद आए ...

मीठे वादे,
पागल मन,
तुम याद आए ...

बात अनकही ,
रात अधूरी ,
तुम याद आए ...

रात की कहानी ....




शबनमी रात
कांपते होंठो से
चाँद को सहलाती है
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …

सर्द हवा
सरगोशी से
कुछ कह जाती है
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …

सुरमई बादल
तारों के आँगन में
रोज़ मिलते हैं
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …

महकता मोगरा
साथ मौसम की अंगडाई
बहकती है खुशबू
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …

ख्वाब की तन्हाई
चुपके से जगती है
तुम फ़िर याद आते हो
तुम्हारी आवाज़ कहीं दूर से आती है …
बहुत दूर से आती है ...




कोई गीत नया मै गाऊँ.....



कोई गीत नया मैं गाऊँ ,
सुर में खोता जाऊं ,
कोई गीत नया मैं गाऊँ …..

मन की अमराई में छुप कर
भीगी सारी रागिनियाँ
ढूंढूं उनको , खो जाऊं ,
सुर में खोता जाऊं ,
कोई गीत नया मैं गाऊँ ……

प्रेम की परिभाषा है धूमिल ,
सोये व्याकुल नैनों में सपने
जागूँ , फ़िर सो जाऊं ,
सुर में खोता जाऊं ,
कोई गीत नया मैं गाऊँ …..

ढलता है दिन धीमे धीमे
शाम सिमटती अलसाई
बोलूँ कुछ , चुप हो जाऊं
सुर में खोता जाऊं ,
कोई गीत नया मैं गाऊँ …..